Tuesday, April 14, 2026

जनरेशन - X १९६५ से १९७९ ...



        ह लेख विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जिनका जन्म   १९६५  से  १९७९ में हुआ है। या उसके आस-पास के लोगभी इसमें समां सकते हैं।  यह लेख मेरे या मेरे जैसे  कुछ लोग जो हम इसे जनरेशन -X  या आगे पीछे के लोगों का जीने का तरीक़ा बताता हैं। 

               यह पीढ़ी अब ४७ से ६१  वर्ष की आयु की ओर बढ़ रही है। हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इसने बहुत सारे बदलाव देखे और आत्मसात किए हैं। और इस पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि यह पीढ़ी हमेशा दहलीज पे खड़ी हैं।  

       यह पीढ़ी, जो कभी  १, २, ३ ,५,१० ,२०, २५, ५० पैसो के सिक्कों  को साथ में देखा हैं, मेहमानों से  पैसे लेने में बेशर्मी भी महसूस नहीं करतीं थी।  स्याही की बोर/पेंसिल/पेन से शुरुआत करने वाली यह पीढ़ी अब बुढ़ापे में भी स्मार्ट फोन, लैपटॉप, पी सी  बड़े ही आराम से चला रही है।

            अब इस ढलते युग में, वो पीढ़ी जो आसानी से स्कूटर और कार चलाती है, ये पीढ़ी, जोशीली और कभी-कभी गंभीर... बहुत कुछ सहा है, लेकिन पूरी तरह से सुसंस्कृत है।  यह वो पीढ़ी हैं, जहा बचपन में  साईकल भी शौक की  चीज़ लगती थी। यह पीढ़ी स्कूटर, और कार चलाने में  माहिर  बन चुकी हैं।  

         टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, इस  पीढ़ी का प्रमुख  आकर्षण  था, वो मिलना भी बहुत बड़ी बात  थी, जिससे इन्हे जीने का मज़ा दोगुना होता था। यह आखिरी पीढ़ी है जिसका बचपन मार्कशीट और टीवी के आगमन से बर्बाद नहीं हुआ। बचपन में उन्हें कुकर रिंग, टायर आदि जैसी चीजों से खेलने में कोई हीन भावना नहीं थी। क्या सलाखें  जमींन में गढ़ना और उसे उखाड़ना  यह भी कोई खेल हो सकता था? हाँ, यह खेल था। और किसी के भी दरवाजे पर दस्तक देना कोई नैतिक उल्लंघन नहीं था।

         यह आखिरी पीढ़ी थी जिसमें किसी दोस्त की माँ के हाथ का बना खाना खाने पर कृतज्ञता का भाव नहीं था और न ही पिता की डांट सुनने पर कोई दुख होता था।  किसी भी पेड़से आम तोड़ना इसे चोरी  कहाना  इस पीढ़ी को मालूम ही नहीं था।  इस पीढ़ी के लोग कक्षा में या स्कूल में अपनी सगी बहन से भी रूठना या लड़ना  यह  बदतमीज़ी के श्रेणी में नहीं आता था। अगर कोई दोस्त दो दिन स्कूल न आए तो वे स्कूल से अपना बैग लेकर उसके घर तक निकल जाने वाली पीढ़ी। 

      अगर किसी के पिताजी स्कूल आते थे तो कोई खेलता हुआ मित्र भागकर उसे जाकर बतया करते थे  "तुम्हारे पिताजी आ गए हैंजल्दी आओ।"  लेकिन गली में, चाहे किसी के घर में कोई भी कार्यक्रम चल रहा हो, यह पीढ़ी बिना किसी कानूनी रोक-टोक के अपनी मनमर्जी करती है।

            यह पीढ़ी कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाजी और पेस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी, सैम्प्रास की टेनिस के साथ-साथ राज, देव, दिलीप से लेकर राजेश, अमिताभ और धर्मेंद्र, जीतेंद्र और बाद में कई नए कलाकारों, यहां तक ​​कि आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी, अनिल की  फिल्मे  देखकर बड़ी हुई है।

ये वो पीढ़ी है जिसके दोस्त वीसीआर किराए पर लेकर पैसे जमा करके एक साथ ४ से ५  फिल्में देखने का मजा लेती थी । ये वही पीढ़ी है जिसने  नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जगगु दादा, वर्षा, सोनम, , सोनाली जैसे अभिनेताओं के मासूम चुटकुलों पर हँसी उड़ाई है।  ये वही पीढ़ी है जिसने अभिनेताओं के फिल्मे देखी  नहीं बल्कि उसमे जीयी हैं। 

शिक्षकों को पीटने में कोई बुराई नहीं है, बस घर में किसी को पता न चले क्योंकि घर पर अलग से  पिटाई  होती  थी । ये वही पीढ़ी है जो इस भावना को संजो कर रखती है। एक ऐसी पीढ़ी जिसने अपने शिक्षकों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। चाहे उन्हें कितना भी ढिंढोरा पीटा गया हो, एक ऐसी पीढ़ी जो दशहरा पर शिक्षकों को सोना भेंट करती है और आज भी, इतने वर्षों बाद, जब वे किसी सेवानिवृत्त शिक्षक को आते देखते हैं, तो बिना किसी शर्म के उन्हें प्रणाम करते हैं। एक ऐसी पीढ़ी जो कॉलेज की छुट्टियों में अपने सपनों को संजो कर रखती है। 

     


   कोई मोबाइल नहीं
, कोई एसएमएस नहीं, कोई व्हाट्सएप नहीं, एक ऐसी पीढ़ी जो मिलने के लिए बेसब्री से इंतजार करती है।

      पंकज उधास की ये पंक्ति  "तुम खूब पैसा कमाते हो, इस पैसे से देश आज़ाद होगा" हमारी आँखों में आँसू ला देती है।

   दिवाली के 'पाँच दिनों की कहानी" जानते हुए ये पीढ़ी जो समझती है कि लिव-इन मैरिज तो दूर, लव मैरिज भी एक "बड़ी चुनौती" है। अरे, ये पीढ़ी जो स्कूल और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़कों को प्रगतिशील मानती है।

    क्या हम फिर से अपनी आँखें बंद कर लेंदस, बीस....... अस्सी, नब्बे........... फिर से यादों का वो सुनहरा दौर।

       बीते दिन तो यादें बनकर रह गए... एक समझदार पीढ़ी जो इसे नहीं समझती, क्योंकि इस पीढ़ी का मानना ​​है कि आज के दिन कल की यादें बन जाएंगेसच्चे जीवन को जीना ही धन्य है।  हमारी भी एक पीढ़ी थी।

      पहले किंडरगार्टन जैसी कोई चीज नहीं थी। बाद में, ६,७ साल की उम्र के बाद, हमें खुद स्कूल जाना पड़ता था। अगर हम स्कूल नहीं भी जाते थे, तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

        बच्चों को साइकिल/बस से स्कूल भेजने का कोई रास्ता नहीं था, हमारे माता-पिता को कभी इस बात का डर नहीं था कि अगर वे अकेले स्कूल जाएँगे तो कुछ अच्छा या बुरा होगा।  हमें बस पास/फेल का ही पता था... प्रतिशत और हमारे बीच कभी कोई संबंध नहीं था।

 मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही हैं क्यों की मैं टूशन क्लास में पढ़ने जा रहा हूँ, क्योंकि इसे नाकाम कहा जाता था। हमें पूरा यकीन था कि किताब में पेड़ की पत्तियां और मोर के पंख डालकर हम होशियार बन सकते हैं। 

 हम किताबों और नोटबुक को कपड़े के थैले में डालकर ले जाते थे  फिर बाद में उसे संदूक में सजा कर रखते थे। हर साल जब हम नया स्कूल बैग  भरने से पहले, किताबों और नोटबुक पर कवर लगाना हमारे जीवन का एक वार्षिक उत्सव होता था।  खत्म होने के बाद किताबें खरीदने-बेचने में हमें शर्म नहीं आती थी। हमारे माता-पिता को हमारी पढ़ाई ज़्यादा  खर्चीली नहीं थी।

      मुझे याद भी नहीं कि कितनी बार हम सड़क पर निकले, एक दोस्त की साइकिल के आगे वाले रैक पर और दूसरा पीछे वाले कैरियर पर बैठकर।

      जब स्कूल में हमारे शिक्षक हमें पीट रहे थे, हम अपने पैरों की उंगलियों पर खड़े थे, हमारे कान लाल और सूजे हुए थे, तब भी हमारा 'अहंकार' कभी आड़े नहीं आया। वास्तव में, हमें तो यह भी नहीं पता था कि 'अहंकार' क्या होता है। मार खाना हमारे दैनिक जीवन का एक आम हिस्सा था। पीटने वाला और पिटाने  वाला दोनों खुश थे।पिटने वाला इसलिए खुश था क्योंकि, "चलो, आज तो मुझे कल से कम परेशानी हुई!"और पिटाने वाला इसलिए खुश था क्योंकि,"क्योंकि फिर से ज्यादा नहीं पिटवाया " 

      जब भी हमें समय मिलता था, हम नंगे पैर,  बिना किसी चप्पल या जूतें हम नंगे पैर से  खेलने का मजा दोगुना था। 

हमने कभी जेब खर्च नहीं माँगा, और हमारे पिता ने भी कभी हमें पैसे नहीं दिए। हमारी कोई ज़रूरत नहीं थी। छोटी-मोटी ज़रूरतें भी घर में कोई न कोई पूरा कर देता था। अगर हमें हर छह महीने में एक बार कुरमुर फरसान खाने को मिल जाता, तो हम बहुत खुश हो जाते थे।

          दिवाली पर पटाखे फोड़ने में हमें ज़रा भी शर्म नहीं आती थी, चाहे वो एक-एक करके ही क्यों न फोड़ें। हम किसी और के पीछे दौड़ पड़ते थे जो पटाखे फोड़ रहा होता था।

           हम अपने माता-पिता को कभी यह नहीं बता पाए कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था। 

        आज हम अनगिनत ताने सहते और संघर्ष करते हुए दुनिया का हिस्सा बन गए हैं। कुछ ने अपनी मनचाही चीज़ें हासिल कर लीं, जबकि बाकी का क्या हाल हुआ, पता नहीं... स्कूल में डबल, ट्रिपल सायकल  पे घूम कर सीटों पर धक्के खाने वाले  दोस्त, वे कहाँ चले गए ? हमें अपने पैसोंसे कैंडी खिलानेवाले दोस्त कहाँ चले गए ?

हम दुनिया में कहीं भी हों, यह सच है कि हम वास्तविक दुनिया में जीते हैं और वास्तविकता में ही बड़े होते हैं। हम कभी अपने कपड़ों को सिकुड़ने से नहीं बचा पाए और रिश्तों में औपचारिकता बनाए रखना नहीं सीख पाए। हमें यह भी नहीं पता था कि छुट्टियों में रोटी और सब्जियों के अलावा खाने के लिए कुछ और भी होता है। 

अपनी किस्मत को दोष दिए बिना, हम अब भी खुशी से सपने देख रहे हैं। शायद यही सपने हमें जीने की प्रेरणा देते हैं। हमने जो जीवन जिया है, उसकी तुलना वर्तमान जीवन से नहीं की जा सकती।

Monday, January 20, 2025

लॉस्ट जनरेशन से बीटा जनरेशन का सफर....

 

 ब २०२५ का साल शुरू हो चूका हैं।  इसे हम इस  जनरेशन बीटा कहते हैं। यह जनरेशन नए युग का होगा।  जो भी मानव साल २०२५ से २०३९ में जन्म लेने वाले समूह को बीटा जनरेशन कहा जायेगा। इस जनरेशन में पैदा होने वाले लोग स्मार्टफोन लबटॉप /कंप्यूटर के साथ पैदा होने वाला पहला जनरेशन होगा। यह जनरेशन शार्ट वीडियो यूट्यूब और A I से अवगत होंगे। 

            

         १८९० से १९१५ पे पैदा होने वाले लोगों को थे  दी लॉस्ट जनरेशन के नाम से सम्बोधन किया जाता हैं।  इस जनरेशन के लोगो का जीवन बहुत ही साधारण था , इस जमानेमे लोगो के पास किताबे  और समाचार पत्र  के अलावा  कुछ नहीं था।  वो भी कुछ लोग ही पढ़ पाते थे। 

           १९०१ से १९१३  दी इंटेरबेलियम जनरेशन यह जनरेशन भी उसी का उदहारण हैं जो लॉस्ट जनरेशन हैं।

           १९१० से  १९२४ दी ग्रेटेस्ट जनरेशन  यह जनरेशन भी उसी तरह हैं।  

             १९२५ से  १९४५ दी साइलेन्ट जनरेशन इस जनरेशन  के अंत में हिरोशिमा और नागासाकी को एटम बॉम्ब से उध्वस्त किया गया था।  यह एक दूसरे महायुद्ध का कालखंड था। 



            १९४६  से १९६४     बेबी बूमर जनरेशन  इस जनरेशन में बहुत ही अविष्कार हुए।  और इसी जनरेशन में भारत आज़ाद हुआ हैं।  और इसी जनरेशन में चीन ने भारत पे अटैक किया था 



               १९६५  से  १९७९  जनरेशन एक्स ( बेबी बस्ट )  इस जनरेशन के लोग अभी जिन्दा हैं जो उम्र, इस उम्र के लोगोने  पेजर से मोबाइल और स्मार्ट फ़ोन और कम्प्यूटर से लैपटॉप का उपयोग करने वाला जनरेशन हैं। 

             १९७५ से १९८५ जीनियल्स  जनरेशन इनका बचपन इस उम्र के लोगो ने बहुत कुछ सीखा हैं, और एक अलग जिंदगी जी रहे हैं। 

          १९८० से १९९४  जनरेशन  वाय ( दी मिलनिएल्स, जनरेशन   नेक्स्ट ) इस जनरेशन के लोगो ने बहुत कुछ सिख रहे हैं।  अभी देश का भार इन्ही लोगो के कंधे पर हैं।  

     १९९५ से २०१२  जनरेशन  ज़ेड ( आइ  जनरेशन   जेन जेड , जेन आइ  ) इस जनरेशन के लोग अभी अभी कॉलेज से बाहर कदम रखे हैं।  कुछ बच्चे पढ़ रहे हैं। 

       २०१३ से २०२५  जनरेशन अल्फा (जेन अल्फ़ा )  इस जनरेशन के अभी बच्चे हैं।  

  यह थ्योरी भारतीय मूल की नहीं किसी विदेशी विचारों की देन हैं। 

(इमेजेस गूगल द्वारा )

Sunday, October 27, 2024

ग़ज़ल-आईना भी रोता है...


क़रीब से देखो तो आईना भी रोता है,
हर एक चेहरा यहाँ अपने ग़मों में खोता है।

मुस्कुराहटें होंठों पे रखनी पड़ीं हमें,
दिल तो हर सांस में सौ दफ़ा संवरता है।

किसी को क्या ख़बर रातों की तन्हाई का हाल,
चाँद भी छुप के अपने ज़ख़्मों को धोता है।

हमने चाहा बहुत किसी से कुछ कह पाएं,
मगर ये दिल भी अब बातों से डरता है।

मंज़िलें पास आकर भी दूर लगती हैं,
क्योंकि राहों में कोई अपना बिछड़ता है।

वफ़ा की चाहतें ले के आए थे कभी,
अब हर रिश्ता इक क़िस्सा सा लगता है।


Chat GPT द्वारा प्रस्तुत



Saturday, October 24, 2020

हे राम तुम फिर आना....




हे राम तुम फिर आना, 

अत्याचार युक्त इस रावणसे,

सीता को बचाना, 

जानकी को बचाना।  


हे राम तुम फिर आना, 

जो भाई का स्वरुप, 

विचारों का लक्ष्मण  बनाना,

आचारो का लक्ष्मण बनाना। 


हे राम तुम फिर आना, 

जो भक्त साथ देता,

विचारों में हनुमान लाना,

आचारों  में हनुमान लाना। 


हे राम तूम  फिर आना,

खाली  विजयादशमी को नहीं,

तुम हर रोज आना, 

तुम हर क्षन आना। 


हे राम तुम फिर आना, 

खंडित  पीड़ित सीता जैसे, 

अबलाओं को बचाना, 

प्रताड़ितों को बचाना। 


हे राम तुम फिर आना,

असुर रावण को जलाना।

तुम विचारों में आना, 

तुम आचारों में आना।  


रावण रूपी पुतला नहीं, 

बल्कि रावण रूपी, 

विचारों को जलाना,

आचारों को जलाना। 


हे राम तुम फिर आना, 

केवल एक दिन नहीं, 

तुम हर रोज़ आना, 

हे राम तुम फिर आना।  




Tuesday, January 1, 2019

समय चक्र -नया साल शुभ हो....



बीत गयी जिंदगी समयजाल में लटकते लटकते,
गएँ  वो पल तारीखोंके पन्नों को टटकते टटकते।।

बीत गए दिन महीने साल इस समय के सफर में,
सफर जिंदगी का गुजरा यूँही वक्त झटकते झटकते।

एक दिन हमारा होगा रह गएँ यह सोचते सोचते,
गुमशुदा की तरह समयचक्र में यूँ ही भटकते भटकते।

वहीँ सफर, वही मंजिल, सिर्फ अंक बदलते रहें,
पुराने समयको यूँ  ही निगल गयां चटकते चटकते।

समय कब आगे निकल गया पता ही नहीं चला,
नयी नयेली दुल्हन सा आया साल मटकते मटकते।

समय की यह चाल अपने द्वार एक दिन आएगी,
जैसे आया नया साल अपना द्वार खटकते खटकते।

समय  खेल हैं भी अजब हैं, घूमता और फिरता भी,
आया हैं नया साल पुराने साल को पटकते पटकते।

तारीखोंका खेल, हम देखते रहे मुसाफिर जैसे,
साल मुबारक़ कहकर, हम भी सटकते सटकते।

Wednesday, July 20, 2016

नेता कहत...

चुनाव में सुमिरिन  सब करें, सत्तासुख में करे न कोय।
जो सत्तासुख में  सुमिरिन करें, हार काहे को होय।

मतदार कब ना निन्दिये ,  जो  पावँन  तलें होय।
जो मत डालने उठ पड़ें, तो हारना निश्चित होय ।

मत जो देखन मैं चला, मतदाता न मिलिया कोय।
जो मत खोजा अपना, मुझसे मतवाला न कोय।

पत्र पढ़ि पढ़ी जग मुआ, पत्रकार भया न कोय।
दो आखर नेता का, पढ़े सो पत्रकार होय।

धीरे-धीरे  रे कामना, कामना सब कुछ होय।
नेता खींचे सौ रुपया, हज़ारों आये फल होय।

जाती पूछो मतदार की, पूछ लीजिय मतदान।
मोल करो सरकार का, पड़ा रहे देश का मान। 

रूपिया फेरत जुग भया, फिरा ना मन का फेर।
पैसा मनका डार दे, रुपीया का मनका फेर।

भाषण एक अनमोल हैं, जो कोई भाषण जानि।
रुपिया तराज़ू तौली के, तब सुख बहार आनि।  

(यह रचना संत कबीर के दोहों का आधुनिकरण  कर  के लिखी गयी हैं। अगर इस लेख से किसी को दुःख या आहात हो तो हमें खेद हैं। - छाया गूगल से  )

अब तो यारों ज़माना खराब हैं...




अब तो यारों ज़माना खराब हैं।
पानी के बोतल में भी शराब हैं।

हर एक सवाल का सवाल हैं।
अब हर एक का यही हाल हैं।
हर सवाल में एक ही जवाब हैं।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

मुझे पता हैं ये तेरीही चाल हैं।
एकेक क्षण मृत्यु और काल हैं।
सपने पुराने अब नयें ख्वाब हैं।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

जीते हैं हम यहाँ, अपनी  शान हैं।
किन्तु पता नहीं कितना मान हैं।
शान से जीने का यही रुबाब हैं।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

हाल को अपने हाल पर छोड़ते हैं।
अब जीते हैं जिंदगी को मरोड़ते हैं।
फिर तो अब आप ही तो जनाब हैं।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

अब अपना हाल भी बेहाल हैं ।
जिंदगी जीने के यह भी चाल हैं।
पी रहे हैं, यह जीना भी शवाब है।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

 दुनियाँ वालों की यह चाल है।
अब हर किसी का यही हाल हैं।
बार बार ऊपरवालेका ख्वाब हैं।
अब तो यारों ज़माना खराब हैं।

Saturday, March 12, 2016

तुम कौन होते हो.....

(फोटो गूगल से साभार )
मैं ये करूँ या मैं वो करूँ, पूछनेवाले तुम कौन होते हो।
देश को गाली मत दो, यह कहनेवालें तुम कौन होते हो ॥

क्या तुम भी खुदको बड़े देशभक्त समझने लगे हो।
देशभक्ती का प्रमाणपत्र बाँटनेवाले तुम कौन होते हो॥

चाहे इस देश को गाली दूँ  या देश की सेना को गाली दूँ ।
अभिव्यक्ती की आज़ादी छीननेवालें तुम कौन होते हो ॥

लोकशाही का आइना दिखानेवाला चौथा खंबा कहलाता हैं ।
पत्रकारिता की जुबाँ को बेचनेवाले तुम कौन होते हो ॥ 

ऐसे दिन आ गए हैं, हर जगह देश विरोधी नारे लगते हैं ।
पत्रकारों का हैं इसे सहारा, यह कहनेवाले तुम कौन होतें हो॥  

अपनी  देश की आम जनता, जो देश पे मर मिटती हैं । 
मिडिया वालें पूछतें, देश पे रोनेवालें तुम कौन होते हो॥  

इस  बार हमें एक होना होगा,  देश को बचाना होगा । 
मीडिया से कहना होगा, देश तोड़नेवालें तुम कौन होते हो॥  

मैं ये करूँ या मैं वो करूँ, पूछनेवाले तुम कौन होते हो।
देश को गाली मत दो यह कहनेवालें तुम कौन होते हो ॥



Saturday, December 27, 2014

नया साल आया, नया साल आया ....



नया साल आया, नया साल आया 
गरीब लाचार अबला को क्या लाया 

सोता हैं पथपट पे सड़क किनारे 
सर्दी  में आसमाँ की चादर पसारें 
जमीं का बिस्तर लिएँ  ही सो पाया  
नया साल आया, नया साल आया 

होटल में काम करनेवाला बाल 
मजदूर बनाया, हाल  हैं बेहाल  
उसके लिए ज्यादा काम लाया 
नया साल आया, नया साल आया 

किसान  खेत में जो फसल उगाया 
उसने भी  उसे खूब मज़ा चखाया 
बाप की लाश देखकर बेटा रोया
नया साल आया, नया साल आया 

बेटी अब घूमती रक्षा का लेकर नारा 
कौन देगा अब उसे रक्षा का सहारा 
दहेज़ में बहु को फिर जिन्दा जलाया 
नया साल आया, नया साल आया 

अब भी सूरज उगता हैं पूरब से 
चाँद भी तो उगता हैं पूरब से 
रात के बाद फिरसे वहीँ दिन आया 
नया साल आया, नया साल आया 

गरीब लाचार अबला को छोड़कर 
उन्हें अपने ही हाल पे छोड़कर 
वहीँ पुराना बधाई सन्देश लाया 
नया साल आया, नया साल आया 

Sunday, February 3, 2013

मैं नारी हूँ ....

मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा यह सारा संसार 
विश्व में मुझसे  चलती जीवन की  रफ़्तार 

फिर भी मुझे कोई कहता, ढंग से रहना 
हर बार सलाह, कपडे भी ढंग के पहनना
मेरे मन में क्या हैं? अब कैसे करू इजहार
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार

मैं सरस्वती, अम्बा, सीता, कई है मेरे रूप
मैं वो सूरज की किरण, मैं जीवन,मैं ही धुप
जीती हूँ लेकर हर्ष  के किरण का इन्तजार
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार 

मैं हूँ सीता, पती के लियें वनवास ले लिया
पती के लियें जिसने सुख को त्याग दिया
फिर कहते हैं, लक्ष्मण रेखा मत कर तू पार  
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार

भाई के लिए छोड देती हैं जो अपना ही  घर 
देखते हैं सब मुझे घरमें परधन समझ कर 
कब होगी शादी, बाप को रहता हैं इन्तजार 
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार 

माँ हूँ, संतान का दर्द जीवन भर सहती हूँ 
जब बच्चों के लियें कई बार भूखी रहती हूँ 
सोचती बुढ़ापेमें कौन देगा सहांरा और प्यार 
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार 

मैं नारी हूँ, अग्नि परीक्षा में जलती हूँ 
मैं नारी हूँ , इस बुरी नज़र में पलती हूँ 
विश्व में मुझपे ही चलती बुराई  की रफ़्तार 
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार 

अब मुझे खुद लड़कर बुराई को हैं जलाना 
अब मुझे काली बन,असुर को हैं  हराना 
मैं नारी हूँ, अब  शक्ती देखेगा सारा संसार 
विश्व में अब  थमेगी इस बुराई की रफ़्तार 
मैं नारी हूँ,  मुझमें है समा  यह सारा संसार 
विश्व में मुझसे चलती जीवन की  रफ़्तार 




Saturday, December 22, 2012

"तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त"

     
"तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त", जब यह गाना मार्केट आया था, इससे यह पता चलता हैं की समाज में औरत और मर्द में कितना फर्क हैं। हमारें समाज का बड़ा हिस्सा हैं जो औरत को चीज समझता हैं।
औरत और मर्द में इतना फर्क क्यूँ हैंकौन हैं इसके लियें जिम्मेदारहमारा सामाजिक ढांचा जो की स्त्री को केवल उपयोग की वस्तु समझता हैं। शायद यही वजह हैं जो स्त्री को हमेशा एक वस्तु की नज़र से देखा जाता हैं और यही बलात्कार की वजह बन जाती हैं, जैसा की 'यूज़ एंड थ्रो'। यही हकीक़त हैं हर एक रेप पीडिता की। 

      स्त्री को आइटम समझकर पेश करना - यह हमारा फ़िल्मी कल्चर बन गया हैं। फिल्मो में अगर हीरो हिरोइनसे छेड़ छाड़ करता हैं तो बड़े ही चाव से देखते हैं। जहाँ हलकट और शिला की जवानी पे ठुमके लगते हैं तो, बड़े ही चाव से हम देखते और पसंद करते हैं। क्या सिर्फ औरत ही आइटम होती हैं? इसका मतलब क्या हैं? हमें इस कल्चर को बदलना होगा और औरत को इस मनोरंजन के रोल से बहार लाना होगा। इस देश में तो एक पोर्न स्टार को भी इतना महत्व देते हैं की वो रातोंरात फेमस बन जाती हैं।   इसेसे लोगों का स्त्री के प्रति देखनेका नज़रिया बदल जाता हैं और यही नज़रिया समाज के लियें घातक बन जाता हैं। आप पोर्न स्टार को देखते और चाहते लेकिन क्या आप अपनी बहन और बेटी को इसी रूप में स्वीकार करोगे


          दूसरी और अहम् बात क्या फाँसी  की सजा मुक़रर करनेसे रेप केसेस में कमी आयेगी? नहीं बिलकुल नहीं! लेकिन हमें यह सोचना होगा की इसे किस तरीके से रोक सकते। इसके लियें एक जबरदस्त इच्छाशक्ती की जरुरत हैं, इच्छाशक्ती आने के लियें इमानदार नेता  लोगों की जरुरत हैं, जो सभी का हेतु  एक ही होना चाहियें,जो की इस सिस्टम में बदलाव ला सकें। जब दुसरें देशों में गर्भपात के कानून की वजह से एक औरत अपनी जान खो देती हैं तो उस देश में तत्काल कानून में बदलाव लाया जाता हैं, यहाँ इतनी देरी  क्यूँ ? कौन हैं इसके लियें जिम्मेद्दार?
             
           सबसे पहले हमारा कानून, विरोधी पक्ष का वकील के  उलटे सीधे सवालों से पीडिता का कई बार रेप होता हैं।  हर एक सवाल  का उत्तर देते समय वही यातना याँद  करना पड़ता हैं, जो की रेप से कम नहीं। जब हमारीं न्यायिक  प्रक्रिया की  देरी जो की पीडिता के सहनशक्ति को चूर चूर कर देती  हैं। 

         इसके बाद आता हैं हमारां राजनीतिक सिस्टम, जहाँ हम रेपिस्ट और गुंडों को चुनते हैं। जितने भी रेप केसेस सामने आतें हैं रेपिस्ट के पीछे कोई कोई राजनेता जरुर होता हैं। इसे बदलना नामुमकिन हैं। क्यूँ की हर पक्ष में यहीं रावण राज करतें हैं और सोने की लंका समझ कर पुरे देश और देश की इज्जत को लुटते हैं। 

          एक और बात  की हमारा पुलिस दल जो की इस मामले को उतना गंभीर नहीं समझता और केस दर्ज करने में जो देरी करते हैं। सबसे पहली बात यह हैं हमारें समाज में बहुत से लोग हैं पुलिसपे भरोसा नहीं करतें, क्यूँ की हमारें नेता लोग पुलिस को  अपने नियंत्रण में रखतें हैं। 

     हमारा  मीडिया, आजकल जो भी समाचार पत्र निकलते हैं, उनका भी योगदान बहुत जादा हैं, क्यूँ की स्त्री को जिस तरह पेश करते हैं लगता हैं समाचार पत्र पढने के लियें नहीं बल्कि देखने के लियें निकलते हैं। जहाँ टाइम्स ऑफ़ इंडिया का सप्लीमेंट बैंगलोर टाइम्स, मुंबई टाइम्स आदि।

         टी वी मीडिया और विज्ञापन जहाँ औरत की जरुरत नहीं होती वहाँ भी औरत की नुमायश होती हैं, जैसा की औरत नहीं एक उपयोग की चीज हैं। हमारें न्यूज़ चैनल इसे एक समाचार का ज़रिया बनाकर अपनी रोजी रोटी सेंक लेते हैं।

          अब आप पुछंगे की इस सब से रेप केसेस से क्या लेना देना हैं? आप ठीक कहतें हैं इससे रेप केसेस से कोई लेना देना नहीं लेकिन इससे एक बात साबित होती हैं की औरत की तरफ जो समाज का देखने का नज़रिया दिखाई  देता हैं, जो "तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त"।   

       जब तक समाज का औरत के देखने का नज़रिया  नहीं बदलता तब तक यह चलता ही रहेगा। जो औरत और मर्द में अंतर हैं उसे हम बदल नहीं सकतें। 

      हम बलात्कारी  को सजा तो मुकरर कर सकते हैं,क्या इससे रेप केसेस में कमी आएगी? क्या जिस किसीभी  देश में मौत की सजा मिलती वहाँ रेप नहीं होतें?

         और हम लोग इंडिया गेट पर मोर्चा निकालते हैं, और वोट देते समय एक गुंडे और बलात्कारी को वोट देते हैं। और अब चिल्ला चिल्ला कर उन्ही के पैर पड़ते हैं।  क्या हम इसें बदल देंगे? इसे बदलना बहुत ही दूर की बात हैं, क्यूँ की हमारा सिस्टम सड गया हैं, अब हमें भी इस सड़े हुए सिस्टम के नशे की लत लग चुकी हैं, जो इस देश की मज़बूरी हैं।  इस दुनियाँ  में कई लोग ऐसे हैं जो बेटी को दुनिया में आने से पहले मार देते हैं। दहेज़ के  लिए बहु को जलातें हैं और  दूसरों की बहन बेटी को देख कर कहतें हैं की "तू चीज बड़ी हैं मस्त मस्त"।

      जब तक हम औरत के तरफ देखने का नजरिया बदलते नहीं तब तक हम इसे रोक नहीं सकते, क्यूँ की समाज में कई ऐसे तत्व हैं जो औरत को चीज समझते हैं, इसे रोकना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिएं। एक जमानें में सेक्सी शब्द का अर्थ गाली होता था आज वही शब्द एक सुन्दरता की मिसाल बन गया  हैं।  इसे बदलना जरुरी हैं जैसा की तू  चीज बड़ी हैं मस्त मस्त ऐसे गाने बंद कर देना चाहियें जो की औरत को एक वस्तु के रूप में प्रस्तुत करतें हैं। जब तक हम इस चीज शब्द का उपयोग करतें हैं तब तक औरत को एक उपयोग की वस्तु बनकर रहेगी, इसे बदलना होगा और इसमें औरत का सहयोग बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

 

Wednesday, November 14, 2012

खोता हुआ बचपन....



एक तरफ जो होटेल में काम करने वाला रामू जब अपने मालिक से बात करता हैं।

"साब  कल छुट्टी चाहियें अपुनको" बाल मजदूर रामू ने अपने मालिक से पूछा।

"क्या करेगा छुट्टी लेकर, काम क्या तेरा बाप आकर करेगा? दिवाली में छुट्टी!" मालिक ने चिल्लायाँ।  

"साब मेरी माँ की तबियत ठीक नहीं हैं" रामू विनम्र होकर  कहा।

"दूंगा एक झापड़ चल वो टेबल साफ कर जा, मेरा मुह क्यूँ देखता हैं?  काम नहीं करेगा तो खाना नहीं मिलेगा और एक बात याद रख छुट्टी नहीं मिलेगी" होटल मालिक ने जवाब दिया। 

     हमारें  देश में कई बच्चे ऐसे हैं, जिसे शिक्षा तो दूर की बात हैं, लेकिन मुलभुत  सुविधाएं मिलना भी मुश्किल हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जो की किसी होटल में या घरोंमें मजदूरी  करके अपना जीवन व्यतीत करतें हैं। अब हमें यह सोचने की जरुरत हैं, जिन  बच्चों को पेट भरने की चिंता सताती हैं, वो शिक्षा के बारें में सोच भी नहीं सकते, अब हमारी पहली प्राथमिकता यह होनी चाहियं रोटी कपडा और मकान के साथ शिक्षा, जब हम सीर्फ शिक्षा पर विचार करतें हैं तो यह गलत होगा की केवल भूके पेट और कपड़ों  के बिना केवल शिक्षा देना सही नहीं होगा। इनका बचपन तो पेट की आग में जल रहा हैं।


  दूसरी तरफ रीमा को अपनी सहेली के साथ बहार खेलने जाना था, इस लियें वो अपनी माँ से पूछती हैं।

"माँ मुझे सीमा के साथ खेलने जाना हैं" रीमा ने माँ से पूछा।

"रीमा तुमने होमवर्क पूरा किया ? चलो पहले छुटियों में दिया हुआ होमवर्क पूरा करों" माँ ने पूछा।

"माँ मैं आने के बाद होमवर्क करुँगी" रीमा ने कहा। 

"रीमा तुम्हें पता हैं? पड़ोस के वर्मा के  बेटेने स्कूल में अव्वल स्थान काबिज किया हैं, देखा हैं कभी उसे दुसरें बच्चों के साथ खेलतें? नहीं ना! चलो होमवर्क करों, कहीं खेलने जाने की जरुरत नहीं हैं" माँ ने कहा।

         दूसरी तरफ हम उन  बच्चों के बारें में सोचना होगा, जो की शिक्षा के भाग दौड़ में अपना बचपन खो  देते हैं। जिन्हें हम एक स्पर्धा में धकेल देते हैं, जो की कभी खत्म नहीं होती, स्कूल के बड़े बैग ओ कंधेपे अटकाकर हर रोज़ स्कूल जाते हैं, जो की जरुरत से ज्यादा मानसिक तनाव स्पर्धा।  अभिभावक के साथ साथ टीचर का दबाव, अब जो बच्चे शिक्षा ले रहें हैं, और जो नही ले रहें हैं, उनमे ज्यादा अंतर नहीं हैं। अब अगर हम यह कहते गए तो कई सवाल उठेंगे, की क्या हम इस शिक्षा को बंद कर देना चाहियें ? नहीं मेरा कहना यह नहीं हैं। लेकिन हमें कुछ ऐसा करना होगा की बच्चे के प्रतिभा के अनुसार शिक्षा देनी होंगी, क्या हम सब यह कर पायेंगे। दूसरी तरफ वह बच्चे जो की प्रतिस्पर्धा के आग में अपना बचपन खो रहें हैं, जो की हमने प्रतिस्पर्धा का एक वर्तुल बना दिया हैं और बच्चे इस वर्तुल में मंजिल के आस में चक्कर काट रहें हैं। क्या यहीं हैं सच्चा बचपन, क्या इसे बदलना जरुरी नहीं? क्या अब वक्त आ गया हैं की  इस  शिक्षा प्रणाली को बदलने की जरुरत हैं। जो की खोता हुआ बचपन वापस ला सकें। 

Thursday, September 27, 2012

पाठकों का आभार - तीन साल का सफ़र


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 देश वीदेश के सभी पाठकों का आभार ...


 ब्लॉगस लिखते लिखते तकरीबन तीन साल का सफ़र में मेरे पाठक दोस्तों की अहम भूमिका रही हैं। जो की देश वीदेश में रहते हैं,जिन्होंने मेरे इस सफ़र को जिन्दा रखा हैं। हमारे जीवन में बहुत सारे मोड़ आते हैं. जहाँ की हमारे स्कूल के दोस्त, बादमें कॉलेज के दोस्त,ऑफिस के दोस्त और अंत में आते हैं नेटवर्क के दोस्त. स्कूल के दोस्त कहाँ है, यह तो पता करना बहुत ही मुश्किल का काम हैं। कॉलेज एक या दो  दोस्त  मिलते हैं, कभी फोन पे बाते होती और हालचाल पूछ लेते हैं। ऑफिस के सभी  दोस्त तो हर रोज मिलते हैं, लेकिन वो बाते नहीं होती जो हम करना चाहते। अब मैं नेटवर्क के दोस्तों की बात करता हूँ। हम तो हर रोज़ मिलते हैं और अपने विचार शेयर करते वो  भी कोई आवाज़ के बिना ही लेकिन उनकी आवाज़ हमारे दिल पे दस्तक जरुर देती हैं. 
                 सुना था भीड़ में भी आदमी अकेला होता हैं।  आजु बाजु में बहुत सारे  ल़ोग  होने के बाद भी सन्नाटा क्यूँ सुनाई देता हैं? भीड़ में बहुत सारी आवाज़े होती, लेकिन उसे केवल मन की आवाज़ ही सुनाई देती हैं।  भीड़ की आवाज़ से मन की  आवाज़ कई गुना ज्यादा होती और इसे ही हम सन्नाटे की आवाजें कहते हैं। इस लिए कुछ जानकार कहते हैं की, आप किसी की बात सुने या ना सुने मन की बात जरूर सुनियेगा।
              
"जीवन"

जीवन के इस सफ़र में बहुत से लोग मिलते हैं! लेकिन कुछ लोग हमेशा के लिए यादगार बन जाते है! कुछ लोग जीवन में  धुंदलीसी  याँदें  छोड़ जाते हैं! बार बार याद करनेसे कुछ धुंदलेसे चेहरे याद आते हैं! लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं! जो मददगार बनकर खुद चले आते हैं! लेकिन हम वही भूल करते हैं! अक्सर उन्ही लोगोंके चेहरे भूल जाते हैं! जिसे हम हमेशा पाते हैं, वही चेहरे भूल जाते हैं।

"प्यारे दोस्तों मैं कोई लेखक या कवी नहीं हूँ, क्यूँ की मैं भी कुछ लिखना चाहता हूँ। इस ज्ञान के सागर मे डुबकी लगाकर कुछ मोती समेटकर आप लोगोंके साथ बाँटना चाहता हूँ। मुझे मालूम हैं की आप सभीको मोतियोंकी परख हैं। इस लिए कुछ गलतियां हुई  तो बेहिचक बता दीजिएगा।"

Thanks

आपका एक साथी 

उत्तमकुमार 

Sunday, September 16, 2012

कॉमन मैन और दो कार्टून


जीवन के बस में सफ़र करते समय मेरी बाजु वाली सीट पर एक आदमी आ बैठा, ऐसे  ही बात करते करते पहचान हो गई और और मैंने पूछा।

"काम क्या करते हो?"

"मैं एक कलाकार हूँ?" उसने कहा।

"कलाकार! कौनसी कला हैं आपके पास?" मैंने पूछ।

"मैं एक  कार्टूनिस्ट हूँ " उसने कहा।

"अच्छा, किस प्रकार के  कार्टून बनाते हैं आप?"

"मैं देश के पार्लमेंट को शौचालय का रूप देना, देश के अशोक चिन्ह को  भेड़िए का रूप देना और ऐसे बहुत सारें, आपने वह समाचार तो सूना होगा की मेरे कुछ कार्टून आपत्तिजनक हैं, यह कहकर सरकार ने मुझे जेल भेजा था। उसने अपने मोबाइल में बताते हुए कहा, यह देखो मैं इस कार्टून में पार्लिमेंट को शौचालय बता दिया, क्या कुछ गलत किया क्या ?"


"क्या पार्लमेंट में शौचालय नहीं हैं? पुरे पार्लमेंट को शौचालय बताने की जरुरत क्या थी? यह तो गलत हैं ना। मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हैं।" मैंने कहा।

"मैं तो कभी पार्लमेंट में गया नहीं, मुझे क्या पता की पार्लमेंट में शौचालय हैं या नहीं। लेकिन उतने बड़े पार्लमेंट  में शौचालय तो होगा ही, नहीं तो खाने पीने के बाद वहाँ के लोग कहाँ जाएंगे?"

"किसी एक कोने में शौचालय बता दिया होता, कुछ तो वजह होगी पुरे पार्लमेंट को शौचालय बताने की? एक बात और, ये जो पार्लमेंट के  लोग वेस्टर्न टॉइलट का उपयोग करते हैं या इंडियन? फिर आप ने वेस्टर्न रूप  में जो टॉइलट बनया, और उसे नेशनल टॉइलट का नाम दिया हैं। इस देश में कई लोग तो ऐसे हैं की,टॉइलट का नाम तक पता नहीं, फिर इसे नेशनल टॉइलट कहने  की वजह क्या हैं?"

"वजह यह हैं की मैं देशप्रेमी हूँ।"

"क्या आपका देशप्रेम वेस्टर्न  टॉइलट तक ही सिमित हैं? फिर तो देशद्रोही इसे क्या समझते होगे?"

"अब मुझे कैसे पता? मैं तो देश प्रेमी हूँ।"

उसने अपने मोबाइलपे दुसरा कार्टून बताते हुए, मोबाइल फोन मेरे हाथ में दिया। मैंने कहा, "अच्छा हैं, कितने का हैं?"

उसने हाँसते हुए कहा, "क्या साहब, क्यूँ मज़ाक करतें हो? यह तो अनमोल हैं।"

"कुछ तो कीमत होगी? कहाँसे लिया हैं?"

"लिया नहीं यह कार्टून मैंने बनाया हैं?"

"मैं कार्टून की नहीं, इस मोबाइल फोन की बात कर रहां हूँ।"

"लेकिन मैं तो इस कार्टून की बात कर रहां हूँ।"

"मैं इस मोबाइल की।"

"क्यूँ पका रहे हो ? हमारी बहस तो इस कार्टून पर हो रही हैं।"

"क्या करूँ साहब मैं एक कॉमन मैन हूँ। मैं बहुत ही दुविधा में जी रहा हूँ। चैनल बदल बदल कर समाचार देखता हूँ, कुछ अच्छा समाचार मिलेगा, जो की कॉमन मैन के लिए होगा। करवट बदल बदल कर सपने देखने की आदत हैं, आज नहीं तो कल महंगाई कम होगी। इस लियें विषय बदल गया होगा। सॉरी सॉरी!! चलों बता दो आप किस कार्टून के बारें में बता रहे थे?"


"यह देखो यह भेड़िए वाला, इसके निचे लिखा हैं की "भ्रष्टमेव जयतें" अब बता दो इससे सरकार क्यूँ एतराज होना चाहियें, जो की मुझे जेल में दाल दिया, क्या देश से प्रेम करना कोई गुनाह हैं?"

"इसे देख कर तो लगता हैं की, एतराज नहीं होना चाहियें। लेकिन एक बात समझ में नहीं आ रही हैं की इसमें देश प्रेम कहाँ हैं?

"देखो मेरी लड़ाई इस भ्रष्टचार के खिलाप हैं, इस लियें इस कार्टून के निचे लिखा हैं पढो।

"भ्रष्टमेव जयते' लिखा हैं, और बिच में खोपड़ी का निशाँ हैं। मैंने देखा, लेकिन इस खोपड़ी के निशाँ का मतलब क्या हैं? क्या यह  देशप्रेमी की निशानी हैं? यह तो खतरा 440 वोल्ट का निशाँ लगता हैं।  पता ही नहीं चल रहा हैं की, भ्रष्टाचार के साथ हैं या इसके खिलाप।"

"गौर से देखो इसके निचे क्या लिखा हैं?"

"हाँ मैंने देखा हैं 'भ्रष्टमेव जयते' लिखा हैं, इस लियें तो पूछ रहाँ हूँ की आप तो भ्रष्टाचार के विरोध में हैं, फिर भी उसी के जय की बात कर रहे हों, ऐसा क्यूँ ?"

"देखो आप एक कॉमन मैन हैं, आप को इस देशप्रेम के बारें क्या पता चलेगा?"

"ठीक कहा साहब आपने, मैं तो कॉमन मैन हूँ ,मुझे हर रोज़ बिजली के झटके और महंगाई के मार दिखाई देती हैं। देश प्रेम क्या होता हैं, आप मेरेसे अच्छा जानते हैं, मुझे वही बिजली का निशाँ दिखाई देगा क्यूँ की एक कमरे में की बिजली बंद करने के बाद दुसरें कमरे की बिजली चलाता हूँ,  बिजली के बिल का झटका ना लगे, इस लिए बार बार वही खोपड़ी का निशाँ दिखाई देता हैं।अच्छा!! एक बात और, इस तीन भेड़ीए का मतलब क्या हैं?"                 

"यह कलाकार की भाषा हैं, आपके समझ में नहीं आयेगी, यही देश प्रेम हैं। इस लियें तो सारें हिन्दुस्तान के लोग सडक पर उतर आयें थे, जो की सरकार पर दवाब बनाकर मुझे जेल से छुड़ाया, समझे? कॉमन मैन।

"एक और सवाल, जो लोग आपकी रिहाई के लिय सडक पर उतरे थे उसमे कॉमन मैन कितने थे?"

"हे भगवान!! चलों मेरा स्टॉप आ गया मैं उतरता हूँ।"उसने सीट से उठकर बैगको  कंधे पे लटकाते हुए कहा।

"जातें जातें फोन की कीमत तो बता दीजिएगा" मैं ऐसा कहते ही उसने हाथसे माथा पटककर निचे उतर गया।

वह जाते ही मैं सोचने लगा, कॉमन मैन वही हैं, जो हर आन्दोलन में शामिल होता हैं। जो हर दिन भ्रष्टाचार और महंगाई के मार से मरता हैं, जो देश के लिए अपना सब कुछ त्याग देता हैं। यही  हैं कॉमन मैन, जो सरकार को चुन कर अपना खजाना उन्ही के हातों में दे देता हैं, जो की देश को लुट सके, यहीं हैं वो कॉमन मैन जिसका देश प्रेम दिखाई नहीं देता।  सोचते सोचते अगला स्टॉप आ गया, उतने में एक औरत की आवाज़ सुनाई दी, "ये  मिस्टर  दिखाई नहीं देता यह रिज़र्व सीट हैं, देखो लिखा हैं सिर्फ महिलाओं के लिए।"

 मैं उस सीट से उठकर दुसरे सीट पर जा बैठा और फिर वहीँ सफर चालू हुआ। मेरे बाजुमें   एक और आदमी आकर बैठ गया फिर से वही सिलसिला चालू हुआ, वही संवाद लेकिन अब विषय दुसरा था।

Sunday, September 9, 2012

ख़रगोश कछुए की दौड़

         

   कहानी कुछ नयी और कुछ पुरानी हैं। एक बार एक जंगल में 'ख़रगोश'और 'कछुए'  के  बिच दौड़ प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा था। जंगल' में उत्साह का माहौल था। इस बार की दौड़ में ख़रगोश से बहुत ही आशा थी, क्यूँ की वह पिछले मुकाबले में 176 कीमी की दौड़, 176 मिनिट में पूरा करके  अव्वल स्थान पर काबिज़ था। इस लियें उसका का नंबर  176 था। 186 नबर की काली जर्सी के साथ कछुए का कुछ अलग ही अंदाज़ था।  जगह जगह बैनर से पूरा जंगल सजाया  गया और मीडिया के जानवर भी मौजूद थे।  यह मुकाबला एक बड़े मैदान से शुरू होकर टेढ़े -मेढ़े  रास्ते से होकर एक बड़े पहाड़पे खत्म होना था।  इमानदार जज जीत का सही निर्णय करने के लिय तत्पर थे, जो की इस स्पर्धा की निगरानी सही ढंग से कर सकें। उधर ख़रगोश टीम के सभी साथी उत्साहित थे। उन्हें पता था की यह दौड़ प्रतियोगिता इस बार भी ख़रगोश ही जितेगा।

           स्पर्धा के ठीक पहलें उधर जंगली टीवी के  रिपोर्टर बन्दर ने ख़रगोश से बात करने लगा, "चलो अब हमारे साथ हैं, ख़रगोश जो की इस स्पर्धा के गतविजेता रहें है, चलो हम अब उन्ही से बात करते हैं।

 "आप ने इस स्पर्धा में जो एक नया रिकॉर्ड बनया था, क्या इस साल भी आप अव्वल आएंगे ?"  रिपोर्टर बन्दर ने पूछा।

"देखो मेरी बराबरी उस कछुए से कभी भी मत करो! यह स्पर्धा मैं ही जीतने वाला हूँ।" ख़रगोश ने जवाब दिया।

"अगर आप यह सपर्धा जीत जातें हैं तो इसका श्रेय  किसे देंगे?" रिपोर्टर ने पूछा।

"मैं आज जो भी हूँ, इन जानवरों  की वजह से हूँ, उन्होंने मुझे प्रेरणा और सहयोग दिया हैं, जो की आगे भी देते रहेंगे" ख़रगोश ने मैदान में बैठे सभी साथियों के तरफ हाथ हिलाते हुए कहा।

जैसा ही ख़रगोश ने हाथ हिलाकर प्रेक्षकों के तरफ देखा, प्रेक्षकगन जोर शोर से उसका स्वागत किया।

"अगर आप इसका श्रेय किसी एक को देना चाहते तो किसे देंगे"  रिपोर्टर ने पूछा।

"मैं यह श्रेय  कौवे को दूंगा जो की मेरे  बॉस और गुरु हैं।" ख़रगोश ने कहा।

"एक आखरी सवाल जीतने के बाद जो राशी मिलेगी उसका क्या करोगे?" रिपोर्टर ने पूछा।

"सब साथी मिल बाँट कर खाएँगे, जैसा की हमने पिछले बार किया था, इसमें सबका योगदान हैं।" ख़रगोश ने कहा।

         रिपोर्टर ने माइक हाथ में लेकर कहने लगा, "ये हैं हमारे ख़रगोश जो की पिछले मुकाबले के विजेता रहे हैं। अब हमें यह देखना होगा क्या इस बार भी वही चैम्पियन होंगे या नहीं? उनके उत्साह और जोश को देखे तो ऐसा लगता हैं की, इस बार भी वो आसानी से जीत जायेंगे।  कैमराबर्ड  उल्लू के साथ मैं रिपोर्टर बन्दर जंगली टीवी से, लाइव। ब्रेक के बाद हम कछुए  से बात करेंगे, और जान लेंगे की वो इस स्पर्धा के बारें में क्या कहतें  हैं।"


   "चलो अब हम ब्रेक के बाद मिलते हैं, दुसरे प्रतिस्पर्धी कछुएजी से।" रिपोर्टर  बन्दर ने कहा।
"क्या आप यह प्रतयोगिता जीत जायेंगें?"
लेकीन कछुए ने  कुछ भी जवाब नहीं दिया, इशारें में ही अपनी बॉस लोमड़ी के तरफ इशारा किया।

उतने में रिपोर्टर बन्दर ने लोमड़ी के तरफ माइक करते हुये पूछा, "क्या आपको लगता हैं की यह स्पर्धा कछुएजी जीत जायेंगे?"

" देखो हमने इस स्पर्धा के लियें बहुत ही हार्ड वर्क किया हैं, इस लियें मुझे लगता हैं की मेहनत का फल जरुर मिलेगा।" लोमड़ी ने कहा।"

"अगर मेहनत का फल मिलता हैं तो, उस फल का क्या करेंगे?" रिपोर्टर ने पूछा।

"क्या बात करते हो?  इसका कुछ हिस्सा हम ख़रगोश के टीम को भी दे देंगे,  जब उनकी जीत का फल वो हमसे मिल बांटकर खाते हैं, तो हम क्यूँ नहीं?"लोमड़ी ने कहा।

"और एक बात, आपने यह कछुआ जी का स्पर्धा क्रमांक 186 देने की वजह क्या हैं।" रिपोर्टर ने पूछा।

"इसके लियें आपको  स्पर्धा के अंत तक इन्तजार करना पडेगा।" लोमड़ी ने हँसते हुए कहा।

"हमारें दुसरे प्रतिस्पर्धी, कछुएजी  की चेहरें पर कोई हाव-भाव नहीं है। लोमड़ी जी ने कहा की मेहनत का फल जरुर मिलेगा। चलों कुछ ही देरमें स्पर्धा शुरू होने वाली ही हैं। कैमराबर्ड उल्लू  के साथ बन्दर।
 
         कुत्ते के भौंकने के साथ साथ यह स्पर्धा आरंभ होती हैं। खरगोश घमंड के साथ दौड़ने लगता हैं। 176 कीमी दौड़ने के बाद पीछे मुड़कर देखता हैं तो, दूर दूर तक कछुआ दिखाई नहीं देता। हरी घाँस पर लेटे लेटे ही सो जाता हैं। लेकिन कछुआ धीरे धीरे चलकर 186 कीमी के मार्क पर पहुँच जाता हैं। जब खरगोश जाग जाता, तब तक कछुआ स्पर्धा जीत चुका था।

      कछुए ने एक नया इतिहास रच दिया हैं।  सभी साथी जश्न मना रहे थे, इस बड़ी जीत का।  जंगली टीवी के रिपोर्टर ने  जब कछुए की जीत के बारें में पूछा तो जवाब आया "लाख सवालों से अच्छी हैं करोड़ों रुपयों की ख़ामोशी।"



          चलों अब हम इस कहानी के अभिप्राय पर नज़र डालते हैं।  यह स्पर्धा दो घोटालों के बिच में हैं, जो की 2जी और कोयला। यहाँ ख़रगोश ने 2जी वालें का अभिनय किया हैं। ठीक इसी तरह कोयले वालें का रोल कछुए ने निभाया हैं, जो की धीरे धीरे चल कर सबसे आगे पहुँच जाता हैं। जंगल का मतलब  देश, और मैदान जो एक संसद, जहाँ  से इस स्पर्धा की शुरुवात होती हैं।  जजोंका रोल कैग ने निभाया, 176 नंबर का मतलब हैं 1.76 लाख करोड़ रूपये, ठीक इसी तरह 186 का मतलब हैं 1.86 लाख करोड़ रूपये। हरी घाँस का मतलब नोटों की हरी गड्डियां। अब हमें यह बताने की जरुरात नही होगी की, यहाँ  कौवा  और लोमड़ी का रोल क्या हैं।
 
         अगर यह स्पर्धा देश के विकास के लियें होती तो कितना अच्छा होता। आज हम भी कछुए की जीत का जश्न मना रहे होते,

(photos from google)