Friday, May 22, 2026

वहीं होंगे.....



चाँद वही होगा, गगन सितारें वहीं होंगे।

दुनिया होगी, कुछ लोग सारे वहीं  होंगे।  


आसमां वही होगा, सिर्फ सांसे अलग होंगे। 

मरने  के लिए, जिंदगी के सहारे वहीं होंगे। 


समंदर वही होंगे , पहाड़  भी वही होंगे। 

नया दिन, बल्कि सागर किनारे वहीं होंगे। 


दिन के बाद रात, रात के बाद दिन होंगे।  

नया साल,बाकि किस्मत के मारे वहीं होंगे। 


कहानी, किताबें  अलग अलग तरह की होंगे। 

शब्द अलग लेकिन, अक्षर के सहारे वहीं होंगे। 


दिन, हप्ते, महीने और साल बदलते  होंगे। 

वही अंधेरा और  जगमगाते तारे वहीं होंगे। 


लोग,नेता, सत्तापक्ष और विपक्ष वहीं होंगे। 

चुनाव आते ही सभी मतों के प्यारे वहीं होंगे। 


किताबें कुछ नई,पुरानी और मजहबी वहीं होंगे।

काफिरों को मारो कहने वाले हत्यारे वहीं होंगे।


जब तक जिंदा है, सांसे सभीकी वहीं होंगे।

धर्म मिटेगा तो भगवान के प्यारे वहीं होंगे।

Sunday, April 26, 2026

डिवोर्स के लिए कम्पनी का यूनियन....

यह लेख सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इस कहानी में नाम, पात्र और स्थान बदल दिए गए है।  

         कामराज एक कंपनी में ऑपरेटर का काम करता था।  उसके घर में डाइवर्स का केस फॅमिली कोर्ट में चल रहा था।  एक दिन वो अपने वकील से बात करता हैं तो पता चलता हैं की अगर वो इसी हालात में अपने बीवी से डाइवर्स लेता हैं तो उसको आधी सैलरी देनी पड़ेगी। वह वकील से पूछता हैं।  

"अगर मेरे पास जॉब नहीं रही तो भी आधी सैलरी देनी पड़ेगी।'

"अगर तुम खुदसे जॉब छोड़ देते हैं तो, उसको सेटलमेंट का आधा हिस्सा देना पड़ेगा।" वकील ने कहा। 

"क्या वकील सहाब कोई  तो रास्ता होगा ना ?" कामराज ने पूछा। 

वकील ने कहा दूसरा रास्ता यह हैं की, "अगर तुम्हे कम्पनी से निकाल दे और उसका कोर्ट में केस चल रहा हो, इस हालत में आपको कुछ देना नहीं पड़ेगा।"  


         हमारी कंपनी एक फार्मास्यूटिकल कंपनी थी। पहले कम्पनी का ऑपरेशन  हेल्थ केयर चलाती थी।  अब हेल्थ केयर ने वर्ल्ड केयर को अपना यूनिट किरयेपर दे रखा था। यूनिट के साथ साथ जो दस कामगार थे वो भी अब वर्ल्ड केयर के लिए काम करते थे। लेकिन उनकी नियुक्ति तो हेल्थ केयर में ही थी। इसके आलावा और एक तीसरी कम्पनी थी जिसका नाम इंडिया केयर था।  अब मामला यह था की हेल्थ केयर बाप के नाम से, वर्ल्ड केयर और इंडिया केयर बेटों के नाम से थी।  वर्ल्ड केयर में नाम के लिए मैं और मेरा दोस्त डायरेक्टर थे। एक बात और थी वर्ल्ड केयर और इंडिया केयर का ऑफिस एक ही स्थान पर  था।  इंडिया केयर का एच आर मैनेजर  ही  वर्ल्ड केयर को भी हैंडल करता था।  

             एक दिन की बात हैं जब इंडिया केयर और वर्ल्ड केयर के एच आर ने  एक दिन के लिए ट्रिप का प्लान बनाया वो केवल स्टाफ  लिए था।  वो जो दस वर्कर थे वो भी मुझे आकर पूछने लगे हमें भी ट्रिप पर ले चलो।  मैंने बात एच  आर और हायर ऑथरिटी को बता दी थी। लेकिन हायर मैनेजमेंट ने इसे इंकार कर दिया। 

     

   अब कामराज ने अपना काम शुरू किया।  क्यों की उसे मौका मिला था की पत्नी से डिवोर्स लेने का। कम्पनी का काम खत्म होने के बाद सभी दस कामगारों एक करके कम्पनी के बहार बुला  लिया। और कहने लगा। 

     "हम दस सालों से ज्यादा इस कम्पनी में काम किया, फिर कम्पनी  ट्रिप पर ले जाने से इंकार किया। "

    "कामराज की बात बिलकुल सही हैं, हमें क्या मिला इससे ?"   दूसरा कामगार बोला। 

     "हम अपना यूनियन बनाएंगे।" तीसरा कामगार बोला।      

     "और जो  छुट्टी  हैं बोलकर मैनेजर ने बतया हैं, फिर भी हम काम पर आएंगे।" कामराज बोला। 

    सभी दस कामगार थे वो ऑपरेटर के पोस्टिंग में थे।  सभी ने निर्णय लिया की यूनियन बनाने का। 

            मैं ऑफिस स्टाफ के साथ ट्रिप पर नहीं गया था।  दूसरे दिन सुबह मुझे सिक्योरिटी गॉर्ड ने फ़ोन लगाया  और कहने लगा वो दस कामगार काम पे आये हुए हैं।  मैंने उसे कहा की एच आर को इन्फॉर्म करने को, ठीक हैं सर कहकर फ़ोन काट दिया। 

            जब वही दस कामगारोने एक बाहरी यूनियन के साथ जुड़कर यूनियन बनाया था।  पिछले बार जब १२ कामगारोने मिलकर हेल्थ केयर में  सी आई  टी  यूनियन बनाया था।  तभी बड़ी मुश्किल से यूनियन छुड़ाया था।  अब की बार वो सी आई टी यु में नहीं बल्कि दूसरे एसोसिशन से जुड़े थे। 

        जब मैं सोमवार को ऑफिस के लिए गया था तो मुझे  वि पि और एच आर ने बुलाया और  एसोसिएशन पत्र दिखाया, और कहा वो दस लोगो ने अपना यूनियन बना लिया हैं। 

         मीटिंग हॉल मेरे  साथ एच  आर, सी यी वो  और भी मुख्य लोग  उपस्थित थे।  सबसे पहले एच आर ने मुझे पूछा। 

"सर अब क्या करना चाहिये?'

मैंने कहा "सभी का सेटलमेंट करवा दो। यह लोग तो वर्ल्ड केयर के नियुक्ति धारक भी नहीं हैं।"

कुछ डिस्कशन के बाद हम लोग सभी को मुवावजा जोड़कर रुपए  ४ लाख का हर एक नाम से चेक तयार हो गया। 

           पांच को दस मिनिट कम थे सभी दस कामगारोंको कॉन्फरन्स रूम में बुला लिया गया। और एच आर कहने लगा। सबसे पहले कामराज को बुलाया गया  और चेक देते हुए एह कहा गया की अब हेल्थ केयर कम्पनी बंद हो चुकी हैं। इस लिए आपका सेटलमेंट कर रहे हैं।  कामराज ने चेक लिया।  इसके साथ साथ सभी कामगारोने अपना अपना चेक लिया और चेक लेते समय यह कह दिया गया की कल से काम को आने की जरुरत नहीं। लेकिन मैनेजमेंट को जब तक चेक अकाउंट में क्लियर नहीं होता तब तक कुछ कह नहीं सकते। आखिर वह दिन आ गया सभी का चेक क्लियर हो चूका था। 

         कुछ दिन और बीत गए और कंपनी के पास एक कोर्ट केस का नोटिस आया। अमाउंट बैंक में जमा होने के बाद भी वो १० कामगार लेबर कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। 

    कामराज ने फिर वकील से मिला और कहा।  "सर अभी तो डिवोर्स  हो जायगा ना अब तो जॉब भी नहीं और केस लेबर कोर्ट में चल रहा हैं।" 

 "हाँ बिलकुल हो जायेगा।"  वकील ने हस्ते हुए कहा। 

         मैं भी कंपनी छोड़ चूका था।  एक दिन कामराज मिला और जब मैंने पूछा डिवोर्स हो गया क्या ? हाँ सर हो गया और दूसरी शादी भी हो गयी। कोर्ट केस अभी  भी चल रहा था। कामराज दूसरा जॉब करके आराम से जिंदगी बिता रहा था। 

 यह थे एक कामगार ने डिवोर्स के लिए कम्पनी में  यूनियन बनाकर कोर्ट में ले गया। 


Tuesday, April 14, 2026

जनरेशन - X १९६५ से १९७९ ...



        ह लेख विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जिनका जन्म   १९६५  से  १९७९ में हुआ है। या उसके आस-पास के लोगभी इसमें समां सकते हैं।  यह लेख मेरे या मेरे जैसे  कुछ लोग जो हम इसे जनरेशन -X  या आगे पीछे के लोगों का जीने का तरीक़ा बताता हैं। 

               यह पीढ़ी अब ४७ से ६१  वर्ष की आयु की ओर बढ़ रही है। हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इसने बहुत सारे बदलाव देखे और आत्मसात किए हैं। और इस पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि यह पीढ़ी हमेशा दहलीज पे खड़ी हैं।  

       यह पीढ़ी, जो कभी  १, २, ३ ,५,१० ,२०, २५, ५० पैसो के सिक्कों  को साथ में देखा हैं, मेहमानों से  पैसे लेने में बेशर्मी भी महसूस नहीं करतीं थी।  स्याही की बोर/पेंसिल/पेन से शुरुआत करने वाली यह पीढ़ी अब बुढ़ापे में भी स्मार्ट फोन, लैपटॉप, पी सी  बड़े ही आराम से चला रही है।

            अब इस ढलते युग में, वो पीढ़ी जो आसानी से स्कूटर और कार चलाती है, ये पीढ़ी, जोशीली और कभी-कभी गंभीर... बहुत कुछ सहा है, लेकिन पूरी तरह से सुसंस्कृत है।  यह वो पीढ़ी हैं, जहा बचपन में  साईकल भी शौक की  चीज़ लगती थी। यह पीढ़ी स्कूटर, और कार चलाने में  माहिर  बन चुकी हैं।  

         टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, इस  पीढ़ी का प्रमुख  आकर्षण  था, वो मिलना भी बहुत बड़ी बात  थी, जिससे इन्हे जीने का मज़ा दोगुना होता था। यह आखिरी पीढ़ी है जिसका बचपन मार्कशीट और टीवी के आगमन से बर्बाद नहीं हुआ। बचपन में उन्हें कुकर रिंग, टायर आदि जैसी चीजों से खेलने में कोई हीन भावना नहीं थी। क्या सलाखें  जमींन में गढ़ना और उसे उखाड़ना  यह भी कोई खेल हो सकता था? हाँ, यह खेल था। और किसी के भी दरवाजे पर दस्तक देना कोई नैतिक उल्लंघन नहीं था।

         यह आखिरी पीढ़ी थी जिसमें किसी दोस्त की माँ के हाथ का बना खाना खाने पर कृतज्ञता का भाव नहीं था और न ही पिता की डांट सुनने पर कोई दुख होता था।  किसी भी पेड़से आम तोड़ना इसे चोरी  कहाना  इस पीढ़ी को मालूम ही नहीं था।  इस पीढ़ी के लोग कक्षा में या स्कूल में अपनी सगी बहन से भी रूठना या लड़ना  यह  बदतमीज़ी के श्रेणी में नहीं आता था। अगर कोई दोस्त दो दिन स्कूल न आए तो वे स्कूल से अपना बैग लेकर उसके घर तक निकल जाने वाली पीढ़ी। 

      अगर किसी के पिताजी स्कूल आते थे तो कोई खेलता हुआ मित्र भागकर उसे जाकर बताया करते थे  "तुम्हारे पिताजी आ गए हैंजल्दी आओ।"  लेकिन गली में, चाहे किसी के घर में कोई भी कार्यक्रम चल रहा हो, यह पीढ़ी बिना किसी कानूनी रोक-टोक के अपनी मनमर्जी करती है।

            यह पीढ़ी कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाजी और पेस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी, सैम्प्रास की टेनिस के साथ-साथ राज, देव, दिलीप से लेकर राजेश, अमिताभ और धर्मेंद्र, जीतेंद्र और बाद में कई नए कलाकारों, यहां तक ​​कि आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी, अनिल की  फिल्मे  देखकर बड़ी हुई है।

ये वो पीढ़ी है जिसके दोस्त वीसीआर किराए पर लेकर पैसे जमा करके एक साथ ४ से ५  फिल्में देखने का मजा लेती थी । ये वही पीढ़ी है जिसने  नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जगगु दादा, वर्षा, सोनम, , सोनाली जैसे अभिनेताओं के मासूम चुटकुलों पर हँसी उड़ाई है।  ये वही पीढ़ी है जिसने अभिनेताओं के फिल्मे देखी  नहीं बल्कि उसमे जीयी हैं। 

शिक्षकों को पीटने में कोई बुराई नहीं है, बस घर में किसी को पता न चले क्योंकि घर पर अलग से  पिटाई  होती  थी । ये वही पीढ़ी है जो इस भावना को संजो कर रखती है। एक ऐसी पीढ़ी जिसने अपने शिक्षकों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। चाहे उन्हें कितना भी ढिंढोरा पीटा गया हो, एक ऐसी पीढ़ी जो दशहरा पर शिक्षकों को सोना भेंट करती है और आज भी, इतने वर्षों बाद, जब वे किसी सेवानिवृत्त शिक्षक को आते देखते हैं, तो बिना किसी शर्म के उन्हें प्रणाम करते हैं। एक ऐसी पीढ़ी जो कॉलेज की छुट्टियों में अपने सपनों को संजो कर रखती है। 

     


   कोई मोबाइल नहीं
, कोई एसएमएस नहीं, कोई व्हाट्सएप नहीं, एक ऐसी पीढ़ी जो एक दूसरे को मिलने के लिए बेसब्री से इंतजार करती है।

      पंकज उधास की ये पंक्ति  "तुम खूब पैसा कमाते हो, इस पैसे से देश आज़ाद होगा" हमारी आँखों में आँसू ला देती है।

   दिवाली के 'पाँच दिनों की कहानी" जानते हुए ये पीढ़ी जो समझती है कि लिव-इन मैरिज तो दूर, लव मैरिज भी एक "बड़ी चुनौती" है। अरे, ये पीढ़ी जो स्कूल और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़कों को प्रगतिशील मानती है।

    क्या हम फिर से अपनी आँखें बंद कर लेंदस, बीस....... अस्सी, नब्बे........... फिर से यादों का वो सुनहरा दौर।

       बीते दिन तो यादें बनकर रह गए... एक समझदार पीढ़ी जो इसे नहीं समझती, क्योंकि इस पीढ़ी का मानना ​​है कि आज के दिन कल की यादें बन जाएंगेसच्चे जीवन को जीना ही धन्य है।  हमारी भी एक पीढ़ी थी।

      पहले किंडरगार्टन जैसी कोई चीज नहीं थी। बाद में, ६,७ साल की उम्र के बाद, हमें खुद स्कूल जाना पड़ता था। अगर हम स्कूल नहीं भी जाते थे, तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

        बच्चों को साइकिल/बस से स्कूल भेजने का कोई रास्ता नहीं था, हमारे माता-पिता को कभी इस बात का डर नहीं था कि अगर वे अकेले स्कूल जाएँगे तो कुछ अच्छा या बुरा होगा।  हमें बस पास/फेल का ही पता था... प्रतिशत और हमारे बीच कभी कोई संबंध नहीं था।

 मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही हैं क्यों की मैं टूशन क्लास में पढ़ने जा रहा हूँ, क्योंकि इसे नाकाम कहा जाता था। हमें पूरा यकीन था कि किताब में पेड़ की पत्तियां और मोर के पंख डालकर हम होशियार बन सकते हैं। 

 हम किताबों और नोटबुक को कपड़े के थैले में डालकर ले जाते थे  फिर बाद में उसे संदूक में सजा कर रखते थे। हर साल जब हम नया स्कूल बैग  भरने से पहले, किताबों और नोटबुक पर कवर लगाना हमारे जीवन का एक वार्षिक उत्सव होता था।  खत्म होने के बाद किताबें खरीदने-बेचने में हमें शर्म नहीं आती थी। हमारे माता-पिता को हमारी पढ़ाई ज़्यादा  खर्चीली नहीं थी।

      मुझे याद भी नहीं कि कितनी बार हम सड़क पर निकले, एक दोस्त की साइकिल के आगे वाले रैक पर और दूसरा पीछे वाले कैरियर पर बैठकर।

      जब स्कूल में हमारे शिक्षक हमें पीट रहे थे, हम अपने पैरों की उंगलियों पर खड़े थे, हमारे कान लाल और सूजे हुए थे, तब भी हमारा 'अहंकार' कभी आड़े नहीं आया। वास्तव में, हमें तो यह भी नहीं पता था कि 'अहंकार' क्या होता है। मार खाना हमारे दैनिक जीवन का एक आम हिस्सा था। पीटने वाला और पिटाने  वाला दोनों खुश थे।पिटने वाला इसलिए खुश था क्योंकि, "चलो, आज तो मुझे कल से कम परेशानी हुई!"और पिटाने वाला इसलिए खुश था क्योंकि,"क्योंकि फिर से ज्यादा नहीं पिटवाया " 

      जब भी हमें समय मिलता था, हम नंगे पैर,  बिना किसी चप्पल या जूतें हम नंगे पैर से  खेलने का मजा दोगुना था। 

हमने कभी जेब खर्च नहीं माँगा, और हमारे पिता ने भी कभी हमें पैसे नहीं दिए। हमारी कोई ज़रूरत नहीं थी। छोटी-मोटी ज़रूरतें भी घर में कोई न कोई पूरा कर देता था। अगर हमें हर छह महीने में एक बार कुरमुर फरसान खाने को मिल जाता, तो हम बहुत खुश हो जाते थे।

          दिवाली पर पटाखे फोड़ने में हमें ज़रा भी शर्म नहीं आती थी, चाहे वो एक-एक करके ही क्यों न फोड़ें। हम किसी और के पीछे दौड़ पड़ते थे जो पटाखे फोड़ रहा होता था।

           हम अपने माता-पिता को कभी यह नहीं बता पाए कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था। 

        आज हम अनगिनत ताने सहते और संघर्ष करते हुए दुनिया का हिस्सा बन गए हैं। कुछ ने अपनी मनचाही चीज़ें हासिल कर लीं, जबकि बाकी का क्या हाल हुआ, पता नहीं... स्कूल में डबल, ट्रिपल सायकल  पे घूम कर सीटों पर धक्के खाने वाले  दोस्त, वे कहाँ चले गए ? हमें अपने पैसोंसे कैंडी खिलानेवाले दोस्त कहाँ चले गए ?

हम दुनिया में कहीं भी हों, यह सच है कि हम वास्तविक दुनिया में जीते हैं और वास्तविकता में ही बड़े होते हैं। हम कभी अपने कपड़ों को सिकुड़ने से नहीं बचा पाए और रिश्तों में औपचारिकता बनाए रखना नहीं सीख पाए। हमें यह भी नहीं पता था कि छुट्टियों में रोटी और सब्जियों के अलावा खाने के लिए कुछ और भी होता है। 

अपनी किस्मत को दोष दिए बिना, हम अब भी खुशी से सपने देख रहे हैं। शायद यही सपने हमें जीने की प्रेरणा देते हैं। हमने जो जीवन जिया है, उसकी तुलना वर्तमान जीवन से नहीं की जा सकती।