चाँद वही होगा, गगन सितारें वहीं होंगे।
दुनिया होगी, कुछ लोग सारे वहीं होंगे।
आसमां वही होगा, सिर्फ सांसे अलग होंगे।
मरने के लिए, जिंदगी के सहारे वही होंगे।
समंदर वही होंगे , पहाड़ भी वही होंगे।
नया दिन, बल्कि सागर किनारे वहीं होंगे।
दिन के बाद रात, रात के बाद दिन होंगे।
नया साल,बाकि किस्मत के मारे वही होंगे।
कहानी, किताबें अलग अलग तरह की होंगे।
शब्द अलग लेकिन, अक्षर के सहारे वहीं होंगे।
दिन, हप्ते, महीने और साल बदलते होंगे।
वही अंधेरा और जगमगाते तारे वहीं होंगे।
लोग,नेता, सत्तापक्ष और विपक्ष वहीं होंगे।
चुनाव आते ही सभी मतों के प्यारे वहीं होंगे।
किताबें कुछ नई,पुरानी और मजहबी वहीं होंगे।
काफिरों को मारो कहने वाले हत्यारे वहीं होंगे।
जब तक जिंदा है, सांसे सभीकी वहीं होंगे।
धर्म मिटेगा तो भगवान के प्यारे वहीं होंगे।
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