यह लेख विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जिनका जन्म १९६५ से १९७९ में हुआ है। या उसके आस-पास के लोगभी इसमें समां सकते हैं। यह लेख मेरे या मेरे जैसे कुछ लोग जो हम इसे जनरेशन -X या आगे पीछे के लोगों का जीने का तरीक़ा बताता हैं।
यह पीढ़ी अब ४७ से ६१ वर्ष की आयु की ओर बढ़ रही है। हमारी पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इसने बहुत सारे बदलाव देखे और आत्मसात किए हैं। और इस पीढ़ी की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह है कि यह पीढ़ी हमेशा दहलीज पे खड़ी हैं।
यह पीढ़ी, जो कभी १, २, ३ ,५,१० ,२०, २५, ५० पैसो के सिक्कों को साथ में देखा हैं, मेहमानों से पैसे लेने में बेशर्मी भी महसूस नहीं करतीं थी। स्याही की बोर/पेंसिल/पेन से शुरुआत करने वाली यह पीढ़ी अब बुढ़ापे में भी स्मार्ट फोन, लैपटॉप, पी सी बड़े ही आराम से चला रही है।
अब इस ढलते युग में, वो पीढ़ी जो आसानी से स्कूटर और कार चलाती है, ये पीढ़ी, जोशीली और कभी-कभी गंभीर... बहुत कुछ सहा है, लेकिन पूरी तरह से सुसंस्कृत है। यह वो पीढ़ी हैं, जहा बचपन में साईकल भी शौक की चीज़ लगती थी। यह पीढ़ी स्कूटर, और कार चलाने में माहिर बन चुकी हैं।
टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, इस पीढ़ी का प्रमुख आकर्षण था, वो मिलना भी बहुत बड़ी बात थी, जिससे इन्हे जीने का मज़ा दोगुना होता था। यह आखिरी पीढ़ी है जिसका बचपन मार्कशीट और टीवी के आगमन से बर्बाद नहीं हुआ। बचपन में उन्हें कुकर रिंग, टायर आदि जैसी चीजों से खेलने में कोई हीन भावना नहीं थी। क्या सलाखें जमींन में गढ़ना और उसे उखाड़ना यह भी कोई खेल हो सकता था? हाँ, यह खेल था। और किसी के भी दरवाजे पर दस्तक देना कोई नैतिक उल्लंघन नहीं था।
यह आखिरी पीढ़ी थी जिसमें किसी दोस्त की माँ के हाथ का बना खाना खाने पर कृतज्ञता का भाव नहीं था और न ही पिता की डांट सुनने पर कोई दुख होता था। किसी भी पेड़से आम तोड़ना इसे चोरी कहाना इस पीढ़ी को मालूम ही नहीं था। इस पीढ़ी के लोग कक्षा में या स्कूल में अपनी सगी बहन से भी रूठना या लड़ना यह बदतमीज़ी के श्रेणी में नहीं आता था। अगर कोई दोस्त दो दिन स्कूल न आए तो वे स्कूल से अपना बैग लेकर उसके घर तक निकल जाने वाली पीढ़ी।
अगर किसी के पिताजी स्कूल आते थे तो कोई खेलता हुआ मित्र भागकर उसे जाकर बतया करते थे "तुम्हारे पिताजी आ गए हैं, जल्दी आओ।" लेकिन गली में, चाहे किसी के घर में कोई भी कार्यक्रम चल रहा हो, यह पीढ़ी बिना किसी कानूनी रोक-टोक के अपनी मनमर्जी करती है।
यह पीढ़ी कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाजी और पेस, भूपति, स्टेफी ग्राफ, अगासी, सैम्प्रास की टेनिस के साथ-साथ राज, देव, दिलीप से लेकर राजेश, अमिताभ और धर्मेंद्र, जीतेंद्र और बाद में कई नए कलाकारों, यहां तक कि आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी, अनिल की फिल्मे देखकर बड़ी हुई है।
ये वो पीढ़ी है जिसके दोस्त वीसीआर किराए पर लेकर पैसे जमा करके एक साथ ४ से ५ फिल्में देखने का मजा लेती थी । ये वही पीढ़ी है जिसने नाना, ओम पुरी, शबाना, स्मिता पाटिल, गोविंदा, जगगु दादा, वर्षा, सोनम, , सोनाली जैसे अभिनेताओं के मासूम चुटकुलों पर हँसी उड़ाई है। ये वही पीढ़ी है जिसने अभिनेताओं के फिल्मे देखी नहीं बल्कि उसमे जीयी हैं।
शिक्षकों को पीटने में कोई बुराई नहीं है, बस घर में किसी को पता न चले क्योंकि घर पर अलग से पिटाई होती थी । ये वही पीढ़ी है जो इस भावना को संजो कर रखती है। एक ऐसी पीढ़ी जिसने अपने शिक्षकों के खिलाफ आवाज नहीं उठाई। चाहे उन्हें कितना भी ढिंढोरा पीटा गया हो, एक ऐसी पीढ़ी जो दशहरा पर शिक्षकों को सोना भेंट करती है और आज भी, इतने वर्षों बाद, जब वे किसी सेवानिवृत्त शिक्षक को आते देखते हैं, तो बिना किसी शर्म के उन्हें प्रणाम करते हैं। एक ऐसी पीढ़ी जो कॉलेज की छुट्टियों में अपने सपनों को संजो कर रखती है।
कोई मोबाइल नहीं, कोई एसएमएस नहीं, कोई व्हाट्सएप नहीं, एक ऐसी पीढ़ी जो मिलने के लिए बेसब्री से इंतजार करती है।
पंकज उधास की ये पंक्ति "तुम खूब पैसा कमाते हो, इस पैसे से देश आज़ाद होगा" हमारी आँखों में आँसू ला देती है।
दिवाली के 'पाँच दिनों की कहानी" जानते हुए ये पीढ़ी जो समझती है कि लिव-इन मैरिज तो दूर, लव मैरिज भी एक "बड़ी चुनौती" है। अरे, ये पीढ़ी जो स्कूल और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़कों को प्रगतिशील मानती है।
क्या हम फिर से अपनी आँखें बंद कर लें? दस, बीस....... अस्सी, नब्बे........... फिर से यादों का वो सुनहरा दौर।
बीते दिन तो यादें बनकर रह गए... एक समझदार पीढ़ी जो इसे नहीं समझती, क्योंकि इस पीढ़ी का मानना है कि आज के दिन कल की यादें बन जाएंगे? सच्चे जीवन को जीना ही धन्य है। हमारी भी एक पीढ़ी थी।
पहले किंडरगार्टन जैसी कोई चीज नहीं थी। बाद में, ६,७ साल की उम्र के बाद, हमें खुद स्कूल जाना पड़ता था। अगर हम स्कूल नहीं भी जाते थे, तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।
बच्चों को साइकिल/बस से स्कूल भेजने का कोई रास्ता नहीं था, हमारे माता-पिता को कभी इस बात का डर नहीं था कि अगर वे अकेले स्कूल जाएँगे तो कुछ अच्छा या बुरा होगा। हमें बस पास/फेल का ही पता था... प्रतिशत और हमारे बीच कभी कोई संबंध नहीं था।
मुझे यह कहते हुए शर्म आ रही हैं क्यों की मैं टूशन क्लास में पढ़ने जा रहा हूँ, क्योंकि इसे नाकाम कहा जाता था। हमें पूरा यकीन था कि किताब में पेड़ की पत्तियां और मोर के पंख डालकर हम होशियार बन सकते हैं।
हम किताबों और नोटबुक को कपड़े के थैले में डालकर ले जाते थे फिर बाद में उसे संदूक में सजा कर रखते थे। हर साल जब हम नया स्कूल बैग भरने से पहले, किताबों और नोटबुक पर कवर लगाना हमारे जीवन का एक वार्षिक उत्सव होता था। खत्म होने के बाद किताबें खरीदने-बेचने में हमें शर्म नहीं आती थी। हमारे माता-पिता को हमारी पढ़ाई ज़्यादा खर्चीली नहीं थी।
मुझे याद भी नहीं कि कितनी बार हम सड़क पर निकले, एक दोस्त की साइकिल के आगे वाले रैक पर और दूसरा पीछे वाले कैरियर पर बैठकर।
जब स्कूल में हमारे शिक्षक हमें पीट रहे थे, हम अपने पैरों की उंगलियों पर खड़े थे, हमारे कान लाल और सूजे हुए थे, तब भी हमारा 'अहंकार' कभी आड़े नहीं आया। वास्तव में, हमें तो यह भी नहीं पता था कि 'अहंकार' क्या होता है। मार खाना हमारे दैनिक जीवन का एक आम हिस्सा था। पीटने वाला और पिटाने वाला दोनों खुश थे।पिटने वाला इसलिए खुश था क्योंकि, "चलो, आज तो मुझे कल से कम परेशानी हुई!"और पिटाने वाला इसलिए खुश था क्योंकि,"क्योंकि फिर से ज्यादा नहीं पिटवाया "
जब भी हमें समय मिलता था, हम नंगे पैर, बिना किसी चप्पल या जूतें हम नंगे पैर से खेलने का मजा दोगुना था।
हमने कभी जेब खर्च नहीं माँगा, और हमारे पिता ने भी कभी हमें पैसे नहीं दिए। हमारी कोई ज़रूरत नहीं थी। छोटी-मोटी ज़रूरतें भी घर में कोई न कोई पूरा कर देता था। अगर हमें हर छह महीने में एक बार कुरमुर फरसान खाने को मिल जाता, तो हम बहुत खुश हो जाते थे।
दिवाली पर पटाखे फोड़ने में हमें ज़रा भी शर्म नहीं आती थी, चाहे वो एक-एक करके ही क्यों न फोड़ें। हम किसी और के पीछे दौड़ पड़ते थे जो पटाखे फोड़ रहा होता था।
हम अपने माता-पिता को कभी यह नहीं बता पाए कि हम उनसे कितना प्यार करते हैं क्योंकि हमें "आई लव यू" कहना नहीं आता था।
आज हम अनगिनत ताने सहते और संघर्ष करते हुए दुनिया का हिस्सा बन गए हैं। कुछ ने अपनी मनचाही चीज़ें हासिल कर लीं, जबकि बाकी का क्या हाल हुआ, पता नहीं... स्कूल में डबल, ट्रिपल सायकल पे घूम कर सीटों पर धक्के खाने वाले दोस्त, वे कहाँ चले गए ? हमें अपने पैसोंसे कैंडी खिलानेवाले दोस्त कहाँ चले गए ?
हम दुनिया में कहीं भी हों, यह सच है कि हम वास्तविक दुनिया में जीते हैं और वास्तविकता में ही बड़े होते हैं। हम कभी अपने कपड़ों को सिकुड़ने से नहीं बचा पाए और रिश्तों में औपचारिकता बनाए रखना नहीं सीख पाए। हमें यह भी नहीं पता था कि छुट्टियों में रोटी और सब्जियों के अलावा खाने के लिए कुछ और भी होता है।
अपनी किस्मत को दोष दिए बिना, हम अब भी खुशी से सपने देख रहे हैं। शायद यही सपने हमें जीने की प्रेरणा देते हैं। हमने जो जीवन जिया है, उसकी तुलना वर्तमान जीवन से नहीं की जा सकती।


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